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View Full Version : মুফতি ভাইদের নিকটে সাদাকা বিষয়ক একটি ফতোয়া জা্নতে চাচ্ছি......



jaishulhind
12-28-2018, 05:36 PM
সম্মানীত মুফতি ভাইদের নিকটে একট ফতুয়া জানতে চাই-
সম্মানীত ভাই, আমাদের মাঝে এমন অনেক ভাই আছেন যারা দ্বীনের পথে দানের কথা বলে আত্মীয় স্বজন্দের থেকে টাকা নিয়ে অনেক সময় সাদাকা দেন, কিন্ত অনেক এমন স্বজন আছে যারা প্রকাশ্যে সুদ ঘুষের লেনদেন করে। আর তাদের টাকা ও উক্ত সাদাকার মধ্যে শামিল হয়, এখন তাদের টাকা হারাম হওয়ার ব্যপারে স্পষ্ট জানা থাকা সত্ব্যেও উক্ত টাকা দ্বীনের পথে সাদাকাহ করার ব্যপারে শরয়ী বিধান কি,,??
(দলীলসহ জানালে খুবই ভাল হত ইন...)

usama alhindi
02-08-2019, 11:53 PM
সুন্দর প্রশ্ন করেছেন ভাই , একটু অপেক্ষা করুন ইনশাআল্লাহ উত্তর পেয়ে যাবেন।

lahul hukmu
05-08-2019, 10:35 PM
আসা করি ভাইরা দলিল ভিত্তিক উত্তর দিবেন ইনশাল্লাহ।

আদনানমারুফ
05-09-2019, 01:20 AM
হারাম মালের ক্ষেত্রে শরিয়তের মূলনীতি হলো যদি তার মালিকের কাছে পৌঁছানো সম্পব হয় তাহলে তা মালিকের কাছে পৌঁছাতে হবে আর যদি মালিকের কাছে পৌঁছানো সম্ভব না হয় তাহলে তা দানের সওয়াবের নিয়ত করা ব্যতীত আল্লাহর রাস্তায় দান করে দিতে হবে, চাই ফকির-মিসকিনকে দেওয়া হোক, বা জিহাদের জন্য দেওয়া হোক কিংবা মাদ্রাসায় দেওয়া হোক। (তবে তা দ্বারা মসজিদ নির্মাণ করা যাবে না) দানের সওয়াবের নিয়ত করা যাবে না কেননা হারাম মাল সদকা করার দ্বারা সদকার সওয়াব পাওয়া যায় না। আল্লাহ তায়ালা পবিত্র, তিনি পবিত্র ও হালাল জিনিস ব্যতীত (সদকা) কবুল করেন না। -সহিহ মুসলিম, ১০১৫
لو مات الرجل وكسبه من بيع الباذق أو الظلم أو أخذ الرشوة يتورع الورثة، ولا يأخذون منه شيئا وهو أولى بهم ويردونها على أربابها إن عرفوهم، وإلا تصدقوا بها لأن سبيل الكسب الخبيث التصدق إذا تعذر الرد على صاحبه

আল্লামা শামী বলেন, যদি কোন ব্যক্তি মারা যায়, আর তার উপার্জিত সম্পদ হয় জুয়া, জুলুম ও ঘুষ থেকে তাহলে ওয়ারিশরা সেই সম্পদ গ্রহণ হতে বিরত থাকবে, এবং যদি সেই সম্পদের মূল মালিক জানা যায় তাহলে তাদের সম্পদ তাদেরকে ফেরত দিয়ে দিবে, অন্যথায় সদকা করে দিবে, কেননা হারাম মাল যখন মালিকের কাছে পৌঁছানো অসম্ভব হয় তখন তা সদকা করে দিতে হয়। -ফতোয়ায়ে শামী, ৬/৩৮৯ দারুল ফিকর।

সুতরাং সুদের টাকা যদি ব্যাংক থেকে প্রাপ্ত হয় তাহলে তা নিয়ে জিহাদের জন্য দান করতে কোন সমস্যা নেই, কেননা ব্যাংকের সুদের টাকা মূল মালিকের নিকট পৌঁছানো অসম্ভব। আর নির্দিষ্ট কারো হতে যদি সুদ বা ঘুষ নেওয়া হয় তাহলে তা সম্ভব হলো মালিকের কাছে পৌঁছাতে হবে। তাই যারা সদকা উসুল করেন তারা সম্ভব হলে মালিককে এই মাসয়ালা বুঝিয়ে তা মূল মালিককে ফিরিয়ে দিতে বলবেন। আর যদি সম্ভব না হয় তাহলে তা জিহাদের জন্য *উসুল করতে সমস্যা নেই।

এ সব কিছু হলো ঐ ব্যক্তির ক্ষেত্রে যার হারাম সম্পদ হালাল সম্পদ থেকে বেশি। আর যার হালাল সম্পদ বেশি, তার সম্পদ পুরোটাই হালালের হুকুমে, সুতরাং তার সম্পদ থেকে হাদিয়া, সদকা কোন কিছুই নিতে কোন সমস্যা নেই। ফতোয়া আলমগীরিতে এসেছে, সুদখোর ও হারাম সম্পদ উপার্জনকারী ব্যক্তি যদি কাউকে হাদিয়া দেয় বা মেহমানদারী করে এবং তার বেশিরভাগ সম্পদ হারাম হয় তাহলে সে তা খাবে না, যতক্ষণ না মালিক তাকে বলে যে, এই খাবারটি হালাল সম্পদ দ্বারা ক্রয় করা হয়েছে, আর যদি তার অধিকাংশ সম্পদ হালাল হয় তাহলে তা গ্রহণ করতে কোন সমস্যা নেই। মুলতাকাত কিতাবে এমনটাই বলা হয়েছে। ফতোয়ায়ে আলমগীরি, ৫/৩৪৩ দারুল ফিকর।

মিম্বারুত তাওহিদের একটি প্রশ্নোত্তরে জিহাদের জন্য হারাম মাল ব্যয় করাকে জায়েয বলা হয়েছে, (অর্থাৎ যখন তা মূল মালিকের নিকট পৌঁছানো অসম্ভব হয়) ফতোয়াটি দেখুন,

ما حكم صرف المال الحرام في الجهاد في سبيل الله؟ رقم السؤال: 7332
السلام عليكم و رحمة الله و بركاته فتشت كثيرا في الأسئلة المطروحة في المنتدى لعلي أجد سؤالا مشابها فلم أجد، و ها أنا أطرحه عليكم و أرجو منكم الاسراع في الرد بارك الله فيكم و في مجهوداتكم. رجل تاب من الاتجار بالمخدرات و أراد التخلص من ماله الحرام فأشرنا اليه بانفاقه في التجهيز و الجهاد في سبيل الله، لكنه استفتى أحد الشيوخ الدي أجابه بعدم الجواز الا في الحالات القصوى و هو الان يطلب منا فتوى مدعومة بالدليل. المرجو من شيوخنا الكرام الاجابة في أسرع وقت ممكن قبل أن يتصرف في المال و سامحونا بارك الله فيكم.
السائل: السيف الحنيف

آكل الربا وكاسب الحرام أهدى إليه أو أضافه وغالب ماله حرام لا يقبل، ولا يأكل ما لم يخبره أن ذلك المال أصله حلال ورثه أو استقرضه، وإن كان غالب ماله حلالا لا بأس بقبول هديته والأكل منها، كذا في الملتقط.
المال إذا كان محرما يشرع التخلص منه عن طريق إنفاقه في أوجه الخير المشروعة. ومن الأدلة في ذالك: 1 - روى الطبراني في المعجم الأوسط عن عاصم بن كليب، عن أبي بردة، عن أبي موسى، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم زار قوما من الأنصار في دراهم، فذبحوا له شاة، وصنعوا له منها طعاما، فأخذ من اللحم شيئا ليأكله، فمضغه ساعة، ولا يسيغه، فقال:"ما شأن هذا اللحم؟ "فقالوا: شاة لفلان، ذبحناها حتى يجيء صاحبها، فنرضيه من لحمها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أطعموها الأسارى"). وفي رواية عند الإمام أحمد: ( ... ثم جيء بالطعام فوضع رسول الله صلى الله عليه و سلم يده ووضع القوم أيديهم ففطن له القوم وهو يلوك لقمته لا يجيزها فرفعوا أيديهم وغفلوا عنا ثم ذكروا فأخذوا بأيدينا فجعل الرجل يضرب اللقمة بيده حتى تسقط ثم أمسكوا بأيدينا ينظرون ما يصنع رسول الله صلى الله عليه و سلم فلفظها فألقاها فقال أجد لحم شاة أخذت بغير أذن أهلها فقامت المرأة فقالت يا رسول الله إنه كان في نفسي أن أجمعك ومن معك على طعام فأرسلت إلى البقيع فلم أجد شاة تباع وكان عامر بن أبي وقاص ابتاع شاة أمس من البقيع فأرسلت إليه ان ابتغي لي شاة في البقيع فلم توجد فذكر لي أنك اشتريت شاة فأرسل بها إلي فلم يجده الرسول ووجد أهله فدفعوها إلى رسولي فقال رسول الله صلى الله عليه و سلم: "أطعموها الأسارى"). والحديث رواه الدارقطني أيضا قريبا من هذا اللفظ. قال شعيب الأرنؤوط: "إسناده قوي رجاله رجال الصحيح". والشاهد من الحديث أن النبي صلى الله عليه أمر بإطعام الأسارى من لحم هذه الشاة التي أخذت بغير إذن صاحبها. وإطعام الأسارى من وجوه الخير التي امر الله بها كما قال تعالى: {وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَى حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا (8) إِنَّمَا نُطْعِمُكُمْ لِوَجْهِ اللَّهِ لَا نُرِيدُ مِنْكُمْ جَزَاءً وَلَا شُكُورًا} [الإنسان: 8، 9]. 2 - عن أبي هريرة، رضي الله عنه، قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم اشترى رجل من رجل عقارا له فوجد الرجل الذي اشترى العقار في عقاره جرة فيها ذهب فقال له الذي اشترى العقار خذ ذهبك مني إنما اشتريت منك الأرض ولم أبتع منك الذهب وقال الذي له الأرض إنما بعتك الأرض وما فيها فتحاكما إلى رجل فقال الذي تحاكما إليه ألكما ولد قال أحدهما لي غلام وقال الآخر لي جارية قال: أنكحوا الغلام الجارية وأنفقوا على أنفسهما منه وتصدقا, رواه البخاري. فهذه القصة رواها النبي صلى الله عليه وسلم وأقرها وإقراره حجة شرعية. 3 - وأما من حيث النظر فإن المال المحرم لا يخرج عن ثلاث حالات: 1 - أن يستهلكه من كسبه من الحرام وينفقه على نفسه فيكون بذالك اكل المال المحرم. 2 - أن يلقي به تخلصا منه ولا يلتفت إلى من أخذه , وفي هذه الحالة قد يضيع المال ولا ينتفع به المسلمون , وقد يعثر عليه من سينفقه في وجوه غير مشروعة بل ربما عثر عليه من يستخدمه في محاربة الدين وإظهار المنكرات .. ولو أمر كل تائب من الكسب الحرام أن يرمي ماله في الطرقات كما ترمى النفايات لضاعت الكثير من أموال المسلمين. 3 - أن يتخلص منه عن طريق إنفاقه في أوجه الخير المشروعة فيسلم هو من المال المحرم ويسلم المال من الضياع , وهذا هو الذي دلت عليه الأدلة السابقة. والله أعلم والحمد لله رب العالمين.